FOLK & TRADITIONAL : BIHAR

BHOJPURI

Bhojpuri folk music-songs... 

Forms of Bhojpuri Folk Music-Song :

  • Kajri

  • Nachari

  • Purva

  • Chaita

  • Phagua

  • Nirgun

  • Birha

  • Lagani

  • Pachara

  • Bhajan

  • Kirtan

The folk music of Bihar has so deeply permeated in the life of the people that it is still alive. It has been preserved infact by the women folk of Mithila in particular and by the village folk, especially the devotees who still keep it alive. It is a pleasure to hear women sing the songs. Bihar, in the ancient times has been an important place for dance and music. In places like Vaishali and Rajgir, in ancient Bihar, beautiful girls acted asNagar Shobhinis or town ornaments (courtesans).

Lord Buddha himself accepted this fact and he himself received an invitation from Amrapalli, the chief courtesan of Vaishali. Theses girls were proficient in music and dancing and were part of processions of religious and social nature. It appears that singing and dancing were the chief amusements of that age. Bhajans,Kirtans, singing of religious songs accompanied by musical instruments like Jhal, Dholak, Harmonium, etc, are still quite common, although this form of entertainment in the villages is on the decline.

 

Entertainment by the singing of lyrics in particular season is also a typical characteristic. Kajari,Chaita,Birha and Basant songs in different seasons hold a special appeal for the villagers. While turning the grinding stone to grind the grain, women-folk burst into ‘Jatasari’ songs. ‘Sohar’ and ‘Jhumar’ songs are forms of traditional entertainment.

 

In jhumar, there is a synthesis of both music and dance. Pastoral songs appeal particularly to the rural folk and these songs constitute significant element of local folklore.

फगुआ गीत

फगुआ गीत

फगुआ गीत

भोजपुरी के पारंपरिक गीत संगीत

भोजपुरी के पारंपरिक गीत संगीत के प्रकार :

  • कजरी

  • नचरी

  • पुर्वा

  • चैता

  • फगुआ

  • निर्गुण

  • बिरहा

  • लगनी

  • पचरा

  • भजन 

  • कीर्तन

भाषाई परिवार के स्तर पर भोजपुरी एक आर्य भाषा है और मुख्य रुप से पश्चिम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा उत्तरी झारखण्ड के क्षेत्र में बोली जाती है। आधिकारिक और व्यवहारिक रूप से भोजपुरी हिन्दी की एक उपभाषा या बोली है। भोजपुरी अपने शब्दावली के लिये मुख्यतः संस्कृतएवं हिन्दी पर निर्भर है कुछ शब्द इसने उर्दू से भी ग्रहण किये हैं। भोजपुरी जानने-समझने वालों का विस्तार विश्व के सभी महाद्वीपों पर है जिसका कारण ब्रिटिश राज के दौरान उत्तर भारत से अंग्रेजों द्वारा ले जाये गये मजदूर हैं जिनके वंशज अब जहाँ उनके पूर्वज गये थे वहीं बस गये हैं।

इन मे सूरिनामगुयानात्रिनिदाद और टोबैगोफिजी आदि देश प्रमुख है। भारत के जनगणना (2001) आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। पूरे विश्व में भोजपुरी जानने वालों की संख्या लगभग 5 करोड़ है। 

डॉ॰ ग्रियर्सन ने भारतीय भाषाओं को अन्तरंग ओर बहिरंग इन दो श्रेणियों में विभक्त किया है जिसमें बहिरंग के अन्तर्गत उन्होंने तीन प्रधान शाखाएँ स्वीकार की हैं -

(1) उत्तर पश्चिमी शाखा

(2) दक्षिणी शाखा और

(3) पूर्वी शाखा।

इस अन्तिम शाखा के अन्तर्गत उड़ियाअसमीबँग्ला और पुरबिया भाषाओं की गणना की जाती है। पुरबिया भाषाओं में मैथिलीमगही औरभोजपुरी - ये तीन बोलियाँ मानी जाती हैं। क्षेत्रविस्तार और भाषाभाषियों की संख्या के आधार पर भोजपुरी अपनी बहनों मैथिली और मगही में सबसे बड़ी है। 

भोजपुरी भाषा का नामकरण बिहार राज्य के आरा (शाहाबाद) जिले में स्थित भोजपुर नामक गाँव के नाम पर हुआ है। पूर्ववर्ती आरा जिले केबक्सर सब-डिविजन (अब बक्सर अलग जिला है) में भोजपुर नाम का एक बड़ा परगना है जिसमें "नवका भोजपुर" और "पुरनका भोजपुर" दो गाँव हैं। मध्य काल में इस स्थान को मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी परमार राजाओं ने बसाया था। उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर भोजपुर रखा था। इसी कारण इसके पास बोली जाने वाली भाषा का नाम "भोजपुरी" पड़ गया। भोजपुरी भाषा का इतिहास 7वीं सदी से शुरू होता है - 1000 से अधिक साल पुरानी! गुरु गोरख नाथ 1100 वर्ष में गोरख बानी लिखा था। संत कबीर दास (1297) का जन्मदिवस भोजपुरी दिवस के रूप में भारत में स्वीकार किया गया है और विश्व भोजपुरी दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

भोजपुरी बहुत ही सुंदर, सरस, तथा मधुर भाषा है। भोजपुरी भाषाभाषियों की संख्या भारत की समृद्ध भाषाओं- बँगला, गुजराती और मराठी आदि बोलनेवालों से कम नहीं है। इन दृष्टियों से इस भाषा का महत्व बहुत अधिक है और इसका भविष्य उज्जवल तथा गौरवशाली प्रतीत होता है।

भोजपुरी भाषा में निबद्ध साहित्य यद्यपि अभी प्रचुर परिमाण में नहीं है तथापि अनेक सरस कवि और अधिकारी लेखक इसके भंडार को भरने में संलग्न हैं। भोजपुरिया-भोजपुरी प्रदेश के निवासी लोगों को अपनी भाषा से बड़ा प्रेम है। 

आचार्य हवलदार त्रिपाठी "सह्मदय" लम्बे समय तक अन्वेषण कार्य करके इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भोजपुरी संस्कृत से ही निकली है। उनके कोश-ग्रन्थ ('व्युत्पत्ति मूलक भोजपुरी की धातु और क्रियाएं') में मात्र 761 धातुओं की खोज उन्होंने की है, जिनका विस्तार "ढ़" वर्ण तक हुआ है। इस प्रबन्ध के अध्ययन से ज्ञात होता है कि 761 पदों की मूल धातु की वैज्ञानिक निर्माण प्रक्रिया में पाणिनिसूत्र का अक्षरश: अनुपालन हुआ है।

इस कोश-ग्रन्थ में वर्णित विषय पर एक नजर डालने से भोजपुरी तथा संस्कृत भाषा के मध्य समानता स्पष्ट परिलक्षित होती है। वस्तुत: भोजपुरी-भाषा संस्कृत-भाषा के अति निकट और संस्कृत की ही भांति वैज्ञानिक भाषा है। भोजपुरी-भाषा के धातुओं और क्रियाओं का वाक्य-प्रयोग विषय को और अधिक स्पष्ट कर देता है। प्रामाणिकता हेतु संस्कृत व्याकरण को भी साथ-साथ प्रस्तुत कर दिया गया है। इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें भोजपुरी-भाषा के धातुओं और क्रियाओं की व्युत्पत्ति को स्रोत संस्कृत-भाषा एवं उसके मानक व्याकरण से लिया गया है।

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भोजपुरी गीत - शिव जोगी होके बैठे जंगलवा में

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