However it should be remembered that most of Jharkhand musical performances are group performances, since solo performances are virtually unknown within the tribal musical aesthetics. 

Jharkhand music does not always necessarily play the role that is purely entertainment. More often than not, they have some ritualistic and social significance attached to them. Sometime they commemorate some tribal incidence of tribal significance and sometime they provide social commentary. In fact, music has often acted as the voice of protest against oppression and has worked as important political tools. However, more often the themes are religious and draw from the mythological canon of tales and stories as subjects of representation.


(ग) ’मानुस होवा’ - ’ऊ गीदर टा (छउवा टा) मानुस भेलइ।’- और यह प्रयोग प्राचीनत्व के बोध के साथ-साथ यथार्थत बोध भी करवाता है। यानी किसी के मानसिक विकास के बाद ही उसे मनुष्य की श्रेणी में गिनने की सही और यथार्थवादी परंपरा

(घ) हिंसा, हुँड़ा, विजइ करा...’- जब पशु मांस के व्यापार के लिए खस्सी वगैरह का बध कर उसका मांस निकाला जाता है, तो कहा जाता है-’ हिँसा लागल हइ, एक हुँड़ा लइ आन। बिना वजन किये समान रूप से किये गये भाग को ’हूँ़ड़ा’ कहा जाता है। उसी प्रकार भोजन के लिए बुलाने में कहा जाता है-’ खाइक तइयार हइ, चला बिजइ करा’। यानी शिकारी मानव की प्राचीनता का परिच और उसके साथ ही शिकार के सामूहिक भोज या पशु शिकार की विजय में हिस्सेदारी का द्योतक। 

 

यथा- हड़प्पा और मोहन जोदड़ो शब्दों के अर्थ बतलाए गए हैं, क्रमशः आकस्मिक प्राकृतिक विपत्ति और हड़प्पा का अर्थ और जोदड़ो (मोहेंजोदड़ो) का अर्थ बतलाया गया है, बुरी तरह टूटा-फूटा ;ठंकसल कमवितउमक वत कमेींचमकद्ध। हम पाते हैं कि खोरठा में हाड़पा (हड़प्पा) और जोदड़ो शब्द का प्रयोग वैसे ही अर्थों में होता है। जैसे- किसी नदी आदि में जब अकस्मात बाढ़ में उफान आ जाता है, तो खोरठा में कहते हैं-’ एखन नाउ-डोंगी कुछ नाँइ लागतउ, एखन हाड़पा नांभल हउ।’ वैसे ही जब कोई उपयोगि सुप, खाँची आदि बस्तु लम्बे समय तक उपयोग के बाद काफी टूट-फट जाय तो कहते हैं-’ इटा जोधड़ो भइ गेलो’ अथवा ’..धोधड़ो भइ गेलो।’

सिंधु सम्यता की खुदाई से बैलगाड़ी का आदि रूप ’सगर गाड़ी’ की प्राप्ति हुई है और झारखंड सहित पूरे खोरठा क्षेत्र में सगर-गाड़ी के अवशेष आज भी प्राप्य हैं। इतना ही नहीं यहाँ सड़क का नामकरण भी सगर गाड़ी के ही नाम से जुड़ा है। सड़क को यहाँ ’सगरठ’ कहा जाता है, यानी सगर गाड़ी चलने का रास्ता।

सिंधु सभ्यता की खुदाई से विश्व की संभवतः प्रथम लौह कारीगरी के प्रमाण मिले हैं। उनके वंशज बाद में भी लोहा को पर्याप्त महत्व देते रहे हैं। खोरठा क्षेत्र में आज भी लोहा को बहुत माना गया है। जब कि आर्य प्रथा में लोहा को निकृष्ट धातु माना गया है। जब कि खोरठा क्षेत्र में इसे पवित्र मानकर शिशु को ’मठिया’ नाम से लोहे का कड़ा पहनाया जाता है। साथ ही यदि द्विविवाह कहीं हो तो सौत का लोहा ’सइतिनेक लोहा’ पिंधेक रेवाज हे। कुछ भाषा कर्मी गलती से खोरठा सहित पूरे संपर्क भाषा परिवार को आर्य परिवारीय मानते रहे हैं। किंतु यह एक भ्रांति है। शब्द-प्रयोगान्वय से ज्ञात होता है कि खोरठा आर्य भिन्न मूल की भाषा है, तभी तो एक ही प्रकार के शब्द के अर्थ आर्य भाषाओं में जैसे पाए जाते हैं, खोरठा में उससे भिन्न अर्थ प्रयोग में आते हैं। 

Tusu Geet
Saraswati Vandana
Doha Geet
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