Folk  &  Traditional 

Jharkhand : Khortha

Chotanagpuri (Jharkhandi) : Khortha folk songs... 

Jharkhand music is largely tribal in nature. It shares many points of commonality with the folk music of Bihar and the music of the neighboring districts of West Bengal with a wide tribal populace like Purulia and Bankura. Like most forms of tribal art, most of the music of Jharkhand is not merely entertainment, although that aspect always remains there, but have great ritualistic and social significance to it. Songs and dances both go hand in hand in Jharkhand musical art. 

The forms of tribal music in Jharkhand are absolutely indigenous and have continued in the same way for time immemorial. The musical instruments, the dancing steps, the vocal inflections all have their unique flavors.

Forms of Khortha Folk Music :

However it should be remembered that most of Jharkhand musical performances are group performances, since solo performances are virtually unknown within the tribal musical aesthetics. 

Jharkhand music does not always necessarily play the role that is purely entertainment. More often than not, they have some ritualistic and social significance attached to them. Sometime they commemorate some tribal incidence of tribal significance and sometime they provide social commentary. In fact, music has often acted as the voice of protest against oppression and has worked as important political tools. However, more often the themes are religious and draw from the mythological canon of tales and stories as subjects of representation.

News Update

छोटानागपुरी (झारखंडी) : खोरठा पारम्परिक गीत... 

खोरठा पारंपरिक गीत संगीत के प्रकार :

  • दोहरी

  • दमकच 

  • झूमर

  • जनानी झूमर

  • झुमटा 

  • प्रत्कली 

  • दाईधारा 

  • मर्दाना झूमर 

  • अखरिया

  • पंचपरगनिया 

  • लुझरी 

  • उदासी 

  • पहिलसांझा 

  • फ़गुआ

  • पावस

  • भिनसरिया

  • अधरतिया

  • नटुआ

  • जादुर

  • नचनी

  • अंगनाई

  • घटवारी

  • जमदा

  • शादीगीत

झारखंडी भाषाओं मे से खोरठा ऐसी भाषा है जो समुद्र (फरक्का के पास) और दामोदर नदी से संबंध रखती है। साथ ही यही ऐसी अकेली झारखंडी भाषा है जिसका भाषा क्षेत्र विदेश (बंगला देश) से संबद्ध है। 

जहाँ तक खोरठा भाषी जन समूह का प्रश्न है, तो खोरठा भाषा झारखंड के दो प्रमंडलों (उत्तरी छोटानागपूर और संथाल परगना) के अधिकांश की मातृभाषा होने के साथ-साथ झारखंड के चौबीस जिलों मे से पंद्रह जिलों की पूणतः या अंशतः संपर्क भाषा है। खोरठा के भाषागत अध्ययन-अनुशीलन से लगता है कि इसकी जड़ें मनुष्य के प्रचीनतम विकास काल तक जाती है। इस परिप्रेक्ष्य मे कुछ प्रयोगों पर गौर करें-

(क) ’रंगिया गरूआ अइलइ....’ - यहाँ ’रंगिया’ शब्द किसी भी रंग का सूचक नहीं है, बल्कि सिर्फ और सिर्फ लाल रंग का निर्देशक है। यानी जिस काल में सिर्फ एक ही प्रारंभिक रंग की पहचान मनुष्य को हो पाई थी तभी का यह शब्द प्रयोग है।

 

(ख) ’गरू सहर-हइ...., गीदर सहर-हइ.....’ यानी मल त्याग के अर्थ मानव और पशु के लिए प्रयोग साम्य भी अति प्रचीनत्व को ही दर्शाता है।


(ग) ’मानुस होवा’ - ’ऊ गीदर टा (छउवा टा) मानुस भेलइ।’- और यह प्रयोग प्राचीनत्व के बोध के साथ-साथ यथार्थत बोध भी करवाता है। यानी किसी के मानसिक विकास के बाद ही उसे मनुष्य की श्रेणी में गिनने की सही और यथार्थवादी परंपरा

(घ) हिंसा, हुँड़ा, विजइ करा...’- जब पशु मांस के व्यापार के लिए खस्सी वगैरह का बध कर उसका मांस निकाला जाता है, तो कहा जाता है-’ हिँसा लागल हइ, एक हुँड़ा लइ आन। बिना वजन किये समान रूप से किये गये भाग को ’हूँ़ड़ा’ कहा जाता है। उसी प्रकार भोजन के लिए बुलाने में कहा जाता है-’ खाइक तइयार हइ, चला बिजइ करा’। यानी शिकारी मानव की प्राचीनता का परिच और उसके साथ ही शिकार के सामूहिक भोज या पशु शिकार की विजय में हिस्सेदारी का द्योतक। 

 

यथा- हड़प्पा और मोहन जोदड़ो शब्दों के अर्थ बतलाए गए हैं, क्रमशः आकस्मिक प्राकृतिक विपत्ति और हड़प्पा का अर्थ और जोदड़ो (मोहेंजोदड़ो) का अर्थ बतलाया गया है, बुरी तरह टूटा-फूटा ;ठंकसल कमवितउमक वत कमेींचमकद्ध। हम पाते हैं कि खोरठा में हाड़पा (हड़प्पा) और जोदड़ो शब्द का प्रयोग वैसे ही अर्थों में होता है। जैसे- किसी नदी आदि में जब अकस्मात बाढ़ में उफान आ जाता है, तो खोरठा में कहते हैं-’ एखन नाउ-डोंगी कुछ नाँइ लागतउ, एखन हाड़पा नांभल हउ।’ वैसे ही जब कोई उपयोगि सुप, खाँची आदि बस्तु लम्बे समय तक उपयोग के बाद काफी टूट-फट जाय तो कहते हैं-’ इटा जोधड़ो भइ गेलो’ अथवा ’..धोधड़ो भइ गेलो।’

सिंधु सम्यता की खुदाई से बैलगाड़ी का आदि रूप ’सगर गाड़ी’ की प्राप्ति हुई है और झारखंड सहित पूरे खोरठा क्षेत्र में सगर-गाड़ी के अवशेष आज भी प्राप्य हैं। इतना ही नहीं यहाँ सड़क का नामकरण भी सगर गाड़ी के ही नाम से जुड़ा है। सड़क को यहाँ ’सगरठ’ कहा जाता है, यानी सगर गाड़ी चलने का रास्ता।

सिंधु सभ्यता की खुदाई से विश्व की संभवतः प्रथम लौह कारीगरी के प्रमाण मिले हैं। उनके वंशज बाद में भी लोहा को पर्याप्त महत्व देते रहे हैं। खोरठा क्षेत्र में आज भी लोहा को बहुत माना गया है। जब कि आर्य प्रथा में लोहा को निकृष्ट धातु माना गया है। जब कि खोरठा क्षेत्र में इसे पवित्र मानकर शिशु को ’मठिया’ नाम से लोहे का कड़ा पहनाया जाता है। साथ ही यदि द्विविवाह कहीं हो तो सौत का लोहा ’सइतिनेक लोहा’ पिंधेक रेवाज हे। कुछ भाषा कर्मी गलती से खोरठा सहित पूरे संपर्क भाषा परिवार को आर्य परिवारीय मानते रहे हैं। किंतु यह एक भ्रांति है। शब्द-प्रयोगान्वय से ज्ञात होता है कि खोरठा आर्य भिन्न मूल की भाषा है, तभी तो एक ही प्रकार के शब्द के अर्थ आर्य भाषाओं में जैसे पाए जाते हैं, खोरठा में उससे भिन्न अर्थ प्रयोग में आते हैं। 

Tusu Geet
Saraswati Vandana
Doha Geet
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