Indian Classical Vocal

Shastriya Sangeet Syllabus

PRAYAG SANGEET SAMITI

(Allahabad)

 

Vocal - Seventh Year

क्रियात्मक-परीक्षा १०० अंको कि होगी।  शास्त्र का एक प्रश्न - पत्र ५० अंको का।
 

क्रियात्मक 

प्रथम प्रश्न पत्र -

शुद्ध सिद्धान्त

1. पिछले सभी वर्षाें के पाठ्यक्रम में दिये गये सभी शास्त्र सम्बन्धी विषयों तथा पारिभाषिक शब्दों का विस्तृतऔर आलोचनात्मक अध्ययन।

2. संगीत के सिद्धान्तांे का वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक विश्लेषण।

3. संगीत की उत्पत्ति तथा इसके सम्बन्ध में आलोचनात्मक विचार।

4. श्रुति समस्या, श्रुति स्वर विभाजन एवं सारणा चतुष्टयी का विस्तृत एवं आलोचनात्मक अध्ययन।

5. ग्राम, मूर्च्छना, आधुनिक संगीत में मूर्च्छनाओं का प्रयोग, जाति गायन और इनका राग गायन में विकसितहोना इत्यादि विषयों का अध्ययन।

6. भारतीय संगीत के इतिहास का काल विभाजन, इनके सम्बन्ध में विभिन्न मत के विषय में पूर्ण जानकारी।

7. प्राचीन काल में भारतीय संगीत के इतिहास तथा इसके स्वरूप पर पूर्ण रूप से विचार - वैदिक संगीत औरउसके स्वर, पौराणिक काल का संगीत, भरत काल का संगीत, मौर्य काल, कनिष्क काल, गुप्त काल कासंगीत तथा प्रबन्ध गायन का काल।8. हिन्दुस्तानी संगीत के विकास में भरत, नारद, मंतग, जयदेव और शारंगदेव के योगदान का विस्तृतअध्ययन।

9. चौदहवीं शताब्दी के पूर्व के निम्नलिखित संगीत ग्रंथों का अध्ययन और उनके निष्कर्ष तथा उनमें वर्णित श्रुति, स्वर,शुद्ध तथा विकृत स्वर, शुद्ध मेल, राग वर्गीकरण, राग स्वरूप, गायन प्रणाली आदि विषयों का विस्तृत आलोचनात्मकएवं तुलनात्मक अध्ययन - भरतकृत नाट्यशास्त्र, मंतगकृत बहुद्देशी, नारदीय शिक्षा, संगीत मकरंद, जयदेव कृतगीत गोविन्द, शारंगदेव कृत संगीत रत्नाकर।

10. कर्नाटक संगीत पद्धति के स्वर, राग, ताल और गायकी के सम्बन्ध में पूर्ण जानकारी तथा उनकी विशेषताएँऔर हिन्दुस्तानी संगीत पद्धति के स्वर, राग, ताल और गायकी से उनकी तुलना।

11. निम्नलिखित विषया े ं का विस्त ृत अध्ययन - स्वर ग ुणान्तर, स्वर स ंवाद एव ं स्वय ंभ ू स्वरा े ं काअध्ययन, हारमोनी, मैलॉडी, पाश्चात्य स्वर सप्तक का विकास, षडज.पंचम तथा षडज.मध्यम भाव से सप्तककी रचना, भारतीय स्वर सप्तक का विकास, कला और शास्त्र, संगीत कला और विज्ञान, संगीत का कलापक्ष और भाव पक्ष, गमक और उसके विभिन्न प्रकार।

12. ध्वनि शास्त्र स े सम्बन्धित विषया े ं का अध्ययन - ध्वनि विज्ञान, ध्वनि की उत्पत्ति, आ ंदा ेलन, ध्वनि का वहन, ध्वनि का वेग ;टमसवबपजल व िैवनदकद्ध, अति स्वर ;व्अमतजवदमेद्ध, ध्वनि की थरथराहट या डोल

13. प्रथम से षष्टम वर्षों के पाठ्यक्रम में दिये गये वाद्य सम्बन्धित सभी पारिभाषिक शब्दों का विस्तृत ज्ञान -मीड़,सूत, घसीट, गमक, कण, खटका, कृन्तन, जमजमा, लाग.डाट, लड़ी.गुत्थी, लड़.गुथाव, छूट, पुकार, तारपरन छंद, फिकरा आदि।

14. संगीत शास्त्र सम्बन्धी विषयों पर लेख लिखने की विशेष क्षमता।

 

द्वितीय प्रश्न पत्र

1. प्रथम से षष्टम वर्ष के सभी पाठ्यक्रम में दिये गये सभी क्रियात्मक संगीत सम्बन्धित शास्त्र का विस्तृत एवंआलोचनात्मक अध्ययन।

2. पाठ्यक्रम के सभी रागों का विस्तृत, आलोचनात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन। रागों में न्यास के स्वर,अलपत्व.बहुत्व के स्वर, विवादी स्वर और इनका प्रयोग, आविर्भाव.तिरोभाव का प्रदर्शन, समप्रकृतिक रागों कीतुलना, रागों में अन्य रागों की छाया आदि विषय के सम्बन्ध में विस्तृत ज्ञान। विगत वर्ष के सभी रागों कापूर्ण ज्ञान होना अनिवार्य है।

3. भारतीय वाद्यों का वर्गीकरण, प्राचीन मध्यकालीन तथा आधुनिक तन्त्र वाद्यों का परिचय। वाद्यों द्वारा उत्पन्नहोने वाले स्वयंभू स्वरों का यथेष्ट ज्ञान।

4. गायन अथवा तन्त्र वाद्यों की गायन अथवा वादन शैलियों के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत, आलोचनात्मक तथातुलनात्मक अध्ययन।

5. पाश्चात्य लिपि पद्धतियाँ जैसे सोलफा पद्धति, चीवह पद्वति, न्यूम्स पद्धति तथा स्टाफ नोटेशन पद्धति काविशेष, आलोचनात्मक तथा तुलनात्मक ज्ञान। कॉर्डस ;ब्ीवतकेद्ध एवं इसका प्रयोग। पाश्चात्य लिपि पद्धतिके गुण और दोष।

6. गायन के विभिन्न घरानों का जन्म, इतिहास, उनका विकास तथा इनकी वंश पंरपराओं का पूर्ण ज्ञान। उनकीगायन शैलियों का परिचय, उनकी विशेषताओं का विस्तृत, आलोचनात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन।

7. देश में प्रचलित लिपि पद्धतियों का विस्तृत, आलोचनात्मक एवं तुलनात्मक अध्ययन। भारतीय संगीत के भावीविकास सम्बन्धित सुझाव तथा इस दृष्टिकोण से लिपि पद्धति की समीक्षात्मक अध्ययन।

8. विभिन्न प्रकार के गीतों तथा उनकी गायकी को विभिन्न लयकारियों में लिखने का पूर्ण ज्ञान।

9. बीसवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध गायक अथवा तंत्र वादकों की जीवनियाँ, संगीत मंे उनका योगदान तथा उनकीशैलियों की विशेषताओं का विशेष अध्ययन।

10. तानसेन और उनके वंशज तथा सैनी घराने की शिष्य परम्परा की पूर्ण जानकारी। इस घराने के गायकोंया वादकों की गायन या वादन शैलियों का विस्तृत अध्ययन।

11. पिछले सभी वर्षों के पाठ्यक्रम में निर्धारित सभी तालों का पूर्ण ज्ञान तथा उन्हें विभिन्न प्रकार की कठिनलयकारियों में लिपिबद्ध करने का ज्ञान।

12. क्रियात्मक संगीत सम्बन्धी विषयों पर लेख लिखने की पूर्ण क्षमता।

 

 

शास्त्र 

मौखिक

1. निम्नलिखित 15 रागों का विस्तृत अध्ययन - शुद्ध सारंग, मारू बिहाग, नन्द, हंसध्वनि, मलूहा केदार, जोग,मद्यमाद सांरग, नारायणी, अहीर भैरव, पूरिया कल्याण, आभोगी कान्हड़ा, सूर मल्हार, चन्द्रकौस, गुजरीतोड़ी, मधुवन्ती।

2. परीक्षार्थियों के लिए उपर्युक्त सभी रागों में विलम्बित तथा दु्रत खयालों को विस्तृत रूप से गाने की पूर्णतैयारी। इनमंे से कुछ रागों में धु्रपद, धमार, तराना, चतुरंग आदि कुशलता पूर्वक गाने का अभ्यास। अपनीपसंद से कुछ रागों में ठुमरी, भजन या भावगीत सुदंर ढंग से गाने की तैयारी।

3. निम्नलिखित 15 रागों का पूर्ण परिचय, आलाप द्वारा इनके स्वरूप का स्पष्ट रूप से प्रदर्शन तथा इनमें एक.एक बंदिश गाने या बजाने का अभ्यास - बंगाल भैरव, रेवा, हंसकिंकिणी, जलधर केदार, जैत (मारवा थाट),धनाश्री (काफी थाट), भीम, शहाना, भूपाल तोड़ी, आनन्द भैरव, सरपरदा, गारा, धानी, जयन्त मल्हार, गोपिकाबसंत।

4. पिछले तथा इस वर्ष के सभी रागों को सुनकर पहचानने में निपुणता।

5. प्रचलित तालों को ताली देकर विभिन्न लयकारियों में बोलने का पूर्ण अभ्यास तथा उनके ठेकों को तबलेपर बजाने का ज्ञान।

6. निम्न तालों का पूर्ण परिचय तथा इन्हें ताली देकर विभिन्न लयकारियों में बोलने का अभ्यास - पश्तो,फ़रोदस्त, खेमटा, गणेश।

मंच प्रदर्शन

1. मंच प्रदर्शन में गायन के परीक्षार्थीं को सर्वप्रथम उपर्युक्त विस्तृत अध्ययन के 15 रागों में से अपनी इच्छानुसारकिसी भी एक राग में विलम्बित तथा दु्रत खयाल लगभग 30 मिनट तक या परीक्षक द्वारा निर्धारित समय मेंपूर्ण गायकी के साथ गायन। इसके बाद थोड़ी देर किसी राग की ठुमरी, भजन या भावगीत गाने का अभ्यास।

2. मंच प्रदर्शन के समय परीक्षाकक्ष में श्रोतागण भी कार्यक्रम सुनने हेतु उपस्थित रह सकते हैं।

3. परीक्षक को अधिकार होगा कि यदि वे चाहें तो निर्धारित समय से पूर्व भी परीक्षार्थी का प्रदर्शन समाप्त करसकते हैं।

 

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