Indian Classical 

Raaga Khamaj
राग खमाज

Khamaj (Devanagari ख़मज) is one of the ten Thaats (parent scales) of Hindustani music. It is also a specific raga within the Khamaj thaat.

 

Many ghazals and thumris are based on Khamaj. It utilizes the shuddha (pure) form of Ni on the ascent, and the komala (flat) form of Ni on the descent, creating a key asymmetry in compositional and improvisational performance.

 

The parent-scale or Thaat of Khamaj, notated in sargam notation, has the following structure: Sa Re Ga Ma Pa Dha NiSa. In Western terms, assuming the tonic (Sa) to be at C, the scale would be: C D E F G A B-flat C. Khamaj thaat is thus equivalent to the mixolydian mode in Western classical music.

 

This raga has been explored more in the lighter forms of Hindustani Classical Music such as Thumri, Tappa etc. Yet a few compositions in Dhrupad and Khayal are found as well.


Aroha & Avaroha
The scale of Khamaj uses only Shuddh swaras.
Aroha : Sa Ga Ma Pa Dha Ni Sa
Avaroha : Sa Ni Dha Pa Ma Ga Re Sa

 

Vadi & Samavadi
Vadi           : Gandhar - Ga 

Samavadi : Nishad - Ni 
 

Pakad & Chalan
The Pakad (catchphrase that often helps in identifying a raga) is:

 

1. Pa Dha Ma Ga Re Sa
2. Ni Dha Ma Pa Dha Ma Ga
3. Ma Pa Dha Ga Ma Re Sa
4. Ni Dha Ma Pa Dha Ma Ga
5. Ga Ma Pa Dha Ni Dha

 

 

 

 

Instrumental Training

Vocal Training

रात्रि के रागों में श्रंगार रस के दो रूप, विप्रलंभ तथा उत्तान श्रंगार से ओत प्रोत है राग खमाज। चंचल प्रक्रुति की श्रंगार रस से सजी हुई यह ठुमरी की रगिनी है। इस राग में गंभीरता की कमी के कारण इसमें ख्याल कम गाये जाते हैं। 


इस राग में आरोह में धैवत का अपेक्षाक्रुत कम प्रयोग किया जाता है जैसे - 

ग म प ध प प सा'

नि ध प; ग म प नि सा'।

 

अवरोह में धैवत से अधिकतर सीधे मध्यम पर आते हैं और पंचम को वक्र रूप से प्रयोग करते हैं जैसे -

नि ध म प ध म ग।

 

अवरोह में रिषभ को कण स्वर के रूप में लेते हैं जैसे - 

म ग रे सा। 
 

इस राग का विस्तार मध्य और तार सप्तक में किया जाता है। जब इस राग में कई रागों का मिश्रण करके गाते हैं तो उसे 'मिश्र खमाज' नाम दिया जाता है।

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