Indian Classical Instrumental

शास्त्रीय संगीत - बांसुरी

The bansuri is a transverse flute of North Asia made from a single hollow shaft of bamboo with six or seven finger holes. An ancient musical instrument associated with cowherds and the pastoral tradition, it is intimately linked to the love story of Krishnala and Radha and is also depicted in Buddhist paintings from around 100 CE. The Bansuri is revered as Lord Krishna's divine instrument and is often associated with Krishna's Rasa lila; mythological accounts tell of the tunes of Krishna's flute having a spellbinding and enthralling effect not only on the women of the Braj, but even on the animals of the region. The North Indian bansuri, typically about 14 inches in length, was traditionally used as a soprano instrument primarily for accompaniment in lighter compositions including film music.

The bass variety (approximately 30", tonic E3 at A440Hz), pioneered by Pannalal Ghosh has now been indispensable in Hindustani Classical music for well over half a century. Bansuris range in size from less than 12" to nearly 40". The word bansuri originates in the Sanskrit bans (बाँस) [bamboo] + sur (सुर) [melody]. There are two varieties of bansuri: transverse, andfipple. The fipple flute is usually played in folk music and is held at the lips like a whistle. Because it enables superior control, variations and embellishments, the transverse variety is preferred in Indian classical music. 

The work opportunity offered by the radio and the new institutions growing around North India encouraged many musicians to take on the flute to further its technique and styles. Bansuri construction is a complex art. The bamboo suitable for making a bansuri needs to possess several qualities. It must be thin walled and straight with a uniform circular cross section and long internodes. Being a natural material, it is difficult to find bamboo shafts with all these characteristics, which in turn makes good bansuris rare and expensive. Suitable species of bamboo (such as Pseudostachyum) with these traits are endemic to the forests of Assam and Kerala.[2]After harvesting a suitable specimen, the bamboo is seasoned to allow naturally present resins to strengthen it. Once ready, a cork stopper is inserted to block one end, next to which the blowing hole is burnt in.

बांसुरी काष्ठ वाद्य परिवार का एक संगीत उपकरण है। नरकट वाले काष्ठ वाद्य उपकरणों के विपरीत, बांसुरी एक एरोफोन या बिना नरकट वाला वायु उपकरण है जो एक छिद्र के पार हवा के प्रवाह से ध्वनि उत्पन्न करता है। होर्नबोस्टल-सैश्स के उपकरण वर्गीकरण के अनुसार, बांसुरी को तीव्र-आघात एरोफोन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत में बांस से निर्मित बांसुरी एक महत्वपूर्ण यंत्र है जिसका विकास पश्चिमी बांसुरी से स्वतंत्र रूप से हुआ है। हिन्दू भगवानकृष्ण को परंपरागत रूप से बांसुरी वादक माना जाता है। पश्चिमी संस्करणों की तुलना में भारतीय बांसुरी बहुत साधारण हैं; वे बांस द्वारा निर्मित होते हैं एवं चाबी रहित होती हैं।

महान भारतीय बांसुरी वादक पन्नालाल घोष ने सर्वप्रथम छोटे से लोक वाद्ययंत्र को बांस बांसुरी (सात छिद्रों वाला 32 इंच लंबा) में परिवर्धित करके इसे परंपरागत भारतीय शास्त्रीय संगीत बजाने योग्य बनाया था तथा इसे अन्य शास्त्रीय संगीत वाद्य-यंत्रों के कद का बनाया था। अतिरिक्त छिद्र ने मध्यम बजाना संभव बनाया, जो कि कुछ परंपरागत रागों में मींदज़ (एम एन, पी एम एवं एम डी की तरह) को सरल बनाता है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की धुनों और सूक्ष्मता को भलीभांति प्रकट करने के लिये पंडित रघुनाथ प्रसन्ना ने बांसुरी वादन के क्षेत्र में विभिन्न तकनीकों का विकास किया है। वास्तव में उन्होंने अपने स्वयं के परिवार सदस्यों को प्रशिक्षण के द्वारा अपने घराने को मजबूत आधार प्रदान किया। इस घराने के शिष्यों में पंडित भोलानाथ प्रसन्ना, पंडित हरी प्रसाद चौरसिया, पंडित राजेन्द्र प्रसन्ना विश्वभर में अपने मधुर संगीत के लिये प्रसिद्ध हैं।

भारतीय कंसर्ट बांसुरी मानक स्वरबद्ध लहरियों (पिचों) पर उपलब्ध हैं। कर्नाटक संगीत में इन स्वरबद्ध लहरियों को नंबर के द्वारा जाना जाता है जैसे कि (सी को स्वर मानते हुये) 1 (सी के लिये), 1-1/2 (सी#), 2 (डी), 2-1/2 (डी#), 3 (ई), 4 (एफ), 4-1/2 (एफ#), 5 (जी), 5-1/2 (जी#), 6 (ए), 6-1/2 (ए#) एवं 7(बी). हालांकि किसी रचना का स्वर अपने आप में नियत नहीं है अतः कंसर्ट के लिये किसी भी बांसुरी का प्रयोग किया जा सकता है (जब तक कि संगत वाद्ययंत्र, यदि हो, भलीभांति स्वर बद्ध न हो जाये) एवं यह मुख्यतः कलाकार की व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है।

भारतीय बांसुरी के दो मुख्य प्रकारों का वर्तमान में प्रयोग हो रहा है। प्रथम, बांसुरी है, जिसमें अंगुलियों हेतु छह छिद्र एवं एक दरारनुमा छिद्र होता है एवं जिसका प्रयोग मुख्यतः उत्तर भारत में हिंदुस्तानी संगीत में किया जाता है। दूसरी, वेणु या पुलनगुझाल है, जिसमें आठ अंगुली छिद्र होते हैं एवं जिसका प्रयोग मुख्य रूप से दक्षिण भारत में कर्नाटक संगीत में किया जाता है। वर्तमान में कर्नाटक संगीत बांसुरी वादकों द्वारा सामान्यतः आरपार अंगुली तकनीक से चलने वाले आठ छिद्रों वाले बांसुरी का प्रयोग किया जाता है। इस तकनीक का प्रारंभ 20वीं शताब्दी में टी. आर. महालिंगम ने किया था। तब इसका विकास बी एन सुरेश एवं डॉ॰ एन. रमानी ने किया[कृपया उद्धरण जोड़ें]. इसके पहले, दक्षिण भारतीय बांसुरी में केवल सात अंगुली छिद्र होते थे जिसके अंगुली मानदंडों का विकास 20वीं शताब्दी के आरंभ में पल्लादम स्कूल के शराबा शास्त्री द्वारा किया गया था।

बांसुरी की ध्वनि की गुणवत्ता कुछ हद तक उसे बनाने में प्रयुक्त हुये विशेष बांस पर निर्भर करती है एवं यह सामान्यतः स्वीकृत है कि सर्वश्रेष्ठ बांस दक्षिण भारत के नागरकोइल क्षेत्र में पैदा होते हैं।

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